आखिर ये कश्मीर-समस्या है क्या ? आजादी से अब तक

कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है | इस राज्य का हमारे देश में विधिवत विलय हुआ था | परन्तु पाकिस्तान ने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया और कश्मीर को छिनने का प्रयास किया | पाकिस्तान हर बार असफल रहा | कारगिल युद्ध ने पाकिस्तान को सबक तो सिखाया परन्तु वह कश्मीर को हथियाने का प्रयास अपनी आतंकवादी गतिविधियों जैसे हत्या ,विस्फोट आदि के जरिये कर रहा है वह धारा 370, जो कश्मीर को विशेष ऊर्जा प्रदान करता है, का भरपूर लाभ उठा रहा है कश्मीरियों में अलगाववादी भावना भर कर | वैसे कश्मीर समस्या को अन्तर्राष्टीय रंग दिया जा चुका है और भविष्य में इस समस्या के चलते विश्व युद्ध के छड़ने  की सम्भावना से भी इन्कार नही किया जा सकता |

पाकिस्तान व चीन कश्मीर के मुद्दे पर एक साथ व भारत के विपक्ष में है | पाक-अधिकृत कश्मीर के अलावा कश्मीर का एक छोटा सा भाग चीन के पास भी है यह भाग पाकिस्तान ने चीन को सौप दिया था | चीन भी 1962 में भारत पर आक्रमण कर चुका है | कुल मिला कर , कश्मीर की समस्या काफी गम्भीर है |

आज कश्मीर – समस्या एक नया ही गुल खिला रही है | इस प्रदेश में आतंकवादी गुटों का एक आतंक सा छाया हुआ है | इस आतंकवाद के पीछे पाक की खुफिया एजेन्सी का बहुत बड़ा हाथ है |

पाकिस्तान की सेना के द्वारा समर्थित भाड़े के उग्रवादी कश्मीर को बर्बाद कर रहे है | पाकिस्तान को अपना बुरा-भला नजर नही आता परन्तु ‘कश्मीर’ नामक अफीम युवाओ को खिला कर यह देश व्यर्थ में धन, मानवो और संसाधनों का विनाश करने पर तुला है | भारत ने कह दिया है की कश्मीर भारत व पाकिस्तान के बीच का मामला है और मध्यस्थता या आत्मनिर्णय जैसे कदमो की कोई आवश्यकता नही है |

आखिर ये कश्मीर-समस्या है क्या ?

हमारे पूर्व प्रधानमत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कई गंभीर प्रयासों द्वारा इस समस्या को बातचीत द्वारा हल करने की कोशिश की परन्तु उनका यह प्रयास निरर्थक रहा |

संक्षिप्त में , कश्मीर समस्या भारत के लिए एक चुनौती है इसका सामना करने के लिए हमारे जनसाधारण , सेनाओ और राजनितिक प्रतिनिधियों को सदैव तत्पर रहा होगा |

भारत में एक राजनीतिक समस्या के रूप में कश्मीर का प्रश्न यों तो स्वतंत्रा-प्राप्ति के तत्काल बाद से एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समस्या बना हुआ है। पर विगत कुछ वर्षों से उसका स्वरूप और भी विषम  से विषमतर होता जा रहा है। भारत का यह समीमांचल राज्य संवैधानिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से अपना विशेष्ज्ञ महत्व रखता है। तभी तो स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काद बाद अमेरिका, इंज्लैंड आदि देश इसके साथ अपने निहित स्वार्थ नत्थी करक ेभारत में उसके विलय के प्रश्न को जान-बूझकर विकटतर बनाते रहे। जान-बूझकर इन देशों, विशेषकर अमेरिका ने पाकिस्तान को भी इस समस्या का एक पक्ष बना दिया और उसकी पीठ पर रहकर आज तक उसने इस प्रश्न का न्योयोचित एंव मानवोचित हल नहीं होने दिया? कश्मीर-समस्याय के वर्तमान स्वरूप पर विचार करने से पहले इसके अतीत के स्वरूप पर एक बार दृष्टिपात कर लेना उचित होगा।

सन 1947 में जब विभाजित होकर भारत अंग्रेज सामा्रज्य से स्वतंत्र हुआ, तब यहां पर स्वतंत्र रियासतों का जाल सा बिछा था। भारत को स्वतंत्र घोषित करते समय अंग्रेजों ने यहां की रियासतों को इस बात के लिए खुला छोड़ दिया कि भौगोलिक, प्राकृतिक, राजनीतिक आदि स्थितियों को देखते हुए वे चाहें तो स्वतंत्र रहें और चाहें तो भारत या पाकिस्तान में अपनी इच्छा से अपना विलय कर लें। भारतीय सीमाओं मे ंपडऩे वाली अन्य सभी रियासतों का भारतीय गणराज्य से विलय हो गया, पर कश्मीर कुछ दिनों तक असमंजसस की स्थिति में पड़ा रहा। उस समय अमेरिका की शहर पाकर पाकिस्तान के कबाइलियों ने भारत की उपेक्षा करते हुए कश्मीर पर अचानक आक्रमण कर दिया। तब वहां के महाराजा हरि सिंह और प्रमुख राजनैतिक दल नेशनल कांफें्रस के नेता शेख अब्दुल्ला ने मिलकर भारत में कश्मीर-विलय घोषित किया और भारत सरकार से अनुरोध किया कि अब देश का भाग बन चुके कश्मीर को कबाइलियों की आड़ में हमला कर रहे पाकिस्तान से बचाए। इस अनुरोध पर भारतीय सेनांए वायु मार्ग से कश्मीर में पहुंची और उन्होंने पाक-कबाइलियों के आक्रमण का मुंहतोड़ उत्तर दिया। जानकार लोगों को कहना है कि यदि भारतीय सेनाओं को वहां उतरने में एक घंटे की भी देरी हो जाती तो श्रीनगर पर पाकिस्तान का कब्जा हो चुका होता। तब समस्या का स्वरूप कहीं अधिक विकट, मारक और संहारक हो चुका होता। अब स्थित यह थी कि श्रीनगर तो बचा, पर पुंछ, उड़ी, राजौरी आदि कश्मीर के लगभग आधे इलाके पाकिस्तान के अनुचित-अयाचित अधिकार में चले गए। तब मुख्य प्रश्न यह उठा कि पाक-अधिकृत कश्मीर को मुक्त कैसे कराया जाए? समय के अनुसार दो रास्ते सामने थे। एक रास्ता तो यहां का था कि भारत अपनी सैनिक-शक्ति के बल पर कश्मीर को स्वतंत्र कराकर अन्य रियासतों के समान ही उसका अंतिम विलय भारत में कर ले। ध्यान रहे कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे विशुद्ध अहिंसावादी व्यक्ति भी समाधान के पक्षपाती थे। उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री और चहेते पं. जवाहरलाल नेहरु को यही सुझाव दिया था कि फौजें चढ़ाकर निर्णय कर लो पर लार्ड और लेडी माऊंटबेटन के मोहजाल में फंसे नेहररू नहीं माने। दूसरा विकल्प अंग्रेज वायसराय लॉर्ड माऊंटबेन का सुझाव था। वह यह कि भारत यह मामला लेकर संयुक्त राष्ट्रसंघ में जाए ओर उसके माध्यम से पाक अधिकृत कश्मीर को खाली करवाकर भारतीय गणराज्य में मिल ले। देश के प्रधानमंत्री नेहरु लार्ड माऊंटबेटन के झांसे में आकर संयुक्त राष्ट्रसंघ में चले गए। इस अदूरदर्शिता और राष्ट्रपिता गांधी की बात न मानने का परिणाम ही है कि कश्मीर-समस्या विकट-से-विकटतर होकर गले की फांस बन गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वहां कई प्रस्ताव पारित किए, रायशुमारी की बात भी कही, पर इस शर्त के साथ कि पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से अपना कब्जा हटा ले। परंतु अमेरिका की शह रहने के कारण पाकिस्तान ने रायशुमारी तक का प्रस्ताव नहीं माना, जिसकी आज वह स्वंय और उसके पिट्ठू कश्मीरी उग्रवादी रट लगा रहे हैं। यदि रूस संयुक्त राष्ट्रसंघ में कई बार अपने विशेषाधिकार का प्रयोग न करता, तो अमेरिका कूटनीति के फलस्वरूप कश्मीर जाने कब का पाकिस्तान के पास चला गया होता।

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आखिर ये कश्मीर-समस्या है क्या ?

ध्यान रहे, संयुक्त राष्ट्रसंघ में पारित एक प्रस्ताव के तहत संयुक्त राष्ट्रसंघ के तटस्थ पर्यवेक्षक भी कश्मीर में नियुक्त किए गए, जो शायद आज भी कार्यरत हैं। पर पाकिस्तान ने उनकी भी कभी परवाह नहीं की। भारत की तत्कालीन सरकार ने उस समय एक और संवैधानिक गलती की। वह यह कि 370 धारा के अंतर्गत कश्मीर को अन्य भारतीय रियासतों और प्रांतों की तुलना में विशेष दर्जा दे दिया। इस धारा के अनुसार कश्मीरी तो भारत में कहीं भी आ-जा और बस सकते हैं, कारोबार एंव नौकरी कर सकते हैं पर कोई भी भारतीय कश्मीर में जमीन-जायदार खरीदकर बस नहीं सकता। वहां पर अपना स्वतंत्र व्यवसाय या नौकरी नहीं कर सकता। जैसे विदेशी पर्यटक वहां आ-जा सकते हैं, वैसे ही भारतीय जन भी , इससे अधिक कुछ नहीं। इसके साथ-साथ भारत कश्मीर और कश्मीरियों को वह सब लगभग मुफ्त यया लागत मात्र पर देता रहा, करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करता रहा कि जो भारत में भारतवासियों को भी प्राप्त नहीं है। इतना सब होने पर भी कश्मीर मुसलमानों का एक वर्ग भारत का न हो सका। वह मानसिक और बौद्धिक रूप से पाकिस्तान के साथ बंधा रहा और बंधता गया। कश्मीर समस्या का आज जो रूप है, वह वस्तुत: उसी आंतरिक बंधाव का ही कारण है। उसी का लाभ उठाकर पाक ने वहां के नवयुवकों को उग्रवादी गतिविधियों का प्रशिक्षण देकर कश्मीर में भेजा। अपने यहां के जरखरीद मुजाहदीन भी लुक-छिपकर भेजे। फलस्वरूप आज कश्मीर में पंजाब से भी कहीं अधिक बढ़-चढक़र हत्या, अपहरण और लूट-पाट का बाजार गर्म है। कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला भी कुछ वर्षों बाद कश्मीर को स्वतंत्र रखने के सपने देखने लगे थे, जिस कारण उन्हें कुछ वर्ष जेल में भी गुजारने पड़े। पर बाद में उनका दिमाग ठीक हो गया और उन्हें दुबारा सत्ता में लाया गया। बीच के वर्षों में बख्शी गुलाम मुहम्मद एंव नेशनल कांफे्रंस के अन्य प्रमुख नेता मुख्यमंत्री रहे परंतु वे भी वहां के जन-मानस को संपूर्णतया भारतीयों के साथ नत्थी न कर सके। शेख अब्दुल्ला के बाद उनके जामाता और फिर पुत्र डॉ1 फारुख अब्दुल्ला कांग्रेस की सहायता से सत्ता में आए, पर पाकिस्तान के गुपचुप बढ़ते हस्तक्षेप एंव प्रभाव को कोई भी रोक नहीं सका। फलस्वरूप फारूख अब्दुल्ला को सताच्युत होकर कश्मीर से पलायन भी कर जाना पड़ा।

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यों तो पाकिस्तान भारत को अकारण ही अपना जन्मजात शत्रु मानता है पर सन 1971 में भारत की सहायता से जब पाकिस्तान टूटा और बंगलादेश का उदय हुआ, तब से वह भारत को भी तोडऩे की फिराक में रहने लगा है। वह अपनी बुनियादी गलतियां सुधारने के लिए कतई तैयार नहीं है। अपनी गलतियों का दंड भारत को देना चाहता है। पहले पंजाब और कश्मीर में वर्तमान उग्रवाद की समस्या की मूल पृष्ठभूमि यही है। कश्मीर का बहाना बनाकर ही पाकिस्तान ने सन 1965 में भी भारत पर आक्रमण किया और मुंह की खाई। सन 1971 की लड़ाई का कारण भी वही बना। सन 1965 के बाद जो शिमला-समझौता हुआ, उसमें यह स्पष्ट प्रावधान है कि भारत-पाक कश्मीर-समेत सभी समस्याओं के समाधान बातचीत द्वारा शांतिपूर्वक हल निकालेंगे। एक मत यह भी है कि शिमला-समझौते में यह प्रावधान भी परोक्ष रूप से किया गया था कि कश्मीर में भारत-पाक जिस स्थिति में है, दोनों हमेशा उसी में बने रहेंगे पर यह बात खुलकर नहीं कही गई। यह प्रावधान भी था कि कश्मीर का प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नहीं उठाया जाएगा, बल्कि आपसी बातचीत से ही हल किया जाएगा। फिर भी पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह प्रश्न उठाता रहा और आज भी उठाने की चेष्टा करता रहता है। परंतु जब कोई भी उसे घास डालने को तैयार नहीं हुआ, तो उसने आतंकवाद का रास्ता अपनाया। इसका आरंभ एक भारतीय वायुयान को अपहत करके पाकिस्तान ले जाने से हुआ। फलस्वरूप कश्मीर घाटी की वर्तमान समस्या-उग्रवाद की समस्या अपनी समूची नृशंसता और कुरूपता लेकर सामने आई। उसके सामने प्रशासन पंगु बनकर रह गया और राष्ट्रपति राज लागू करना पड़ा।

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आज समूची कश्मीर घाटी हिंसा की आग में जल रही है और खून से लथपथ हो रही है। वहां स्थित मंदिर तबाद कर दिए गए हैं। हिंदुओं को लाखों की संख्या में भारत में आने को विवश कर दिया गया है। हजारों को मार डाला गया है। युवतियों को अपमानित और अमानवीय ढंग से पीडि़त किया गया है। लखपति-करोड़पति कश्मीरी हिंदू फुटपाथी जीवन जीने को बाध्य हो गया है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल तुष्टीकरण और मात्र वोट की राजनीति खेल रहे हैं। जबकि कश्मीर जलकर अपने अस्तित्व के मूल स्वरूप से हाथ धोता जा रहा है। यह राजनीतिक अदूरदर्शिता का ही परिणाम है कि समाधान में समर्थ लोगों को वहां कार्य नहीं करने दिया जाता। फलस्वरूप उग्रवादी कभी किसी का अपहरण कर लेते हैं, कभी लूट और मार-काट डालते हैं। लगता है वहां का प्रत्येक  अहिंदू नागरिक उग्रवादियों का हमदर्द है।

समस्या की उग्रता पर विचार करने के बाद अब उसके समाधान पर विचार कर लिया जाए। हमारे विचार में कश्मीर समस्या का पुख्ता और निर्णायक समाधान आज भी वही है जो आरंभ में स्वंय गांधीजी ने सुझाया था। वह है सैन्य बल से अधिकृत क्षेत्र को मुक्त कराना और भारत में संपूर्ण विलय। दूसरे धारा 370 को समाप्त करना भी बहुत आवश्यक है। इस प्रकार विशेष दर्जा तो समाप्त करना ही चाहिए, अतिरिक्त सुविधांए समाप्त कर समस्त भारतीय कानून भी वहां लागू होने चाहिए। पाकिस्तान से लगी सीमांए पूरी तरह सील कर दी जानी चाहिए। किसी के भी तुष्टीकरण की नीति त्यागी जानी चाहिए। हमारे विचार में कुल मिलाकर यही वे उपाय हैं जिन्हें अपनाकर आज के माहौल की भयानकता पर काबू पाया जा सकता है। इसके लिए चाहिए दृढ-संकल्प और साहस के साथ राष्ट्रीय साध्य का अदम्य उत्साह। यदि शासक दल ऐसा नहीं कर पाते तो कहा जाएगा कि वे महज सत्ता के भूखे और तन-मन से बौने लोग हैं-बस।

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